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जोड़ों के दर्द को हल्के में ना ले, यह भयावह हो सकता है

इक्कतीस साल के अखिल गोंसालवे को अचानक उनकी कलाई में जोर का दर्द हुआ था। डॉक्टर के पास जाने के बाद भी उनके दर्द का तुरंत  पता नहीं लग सका बाद में मालूम हुआ कि कुछ दिन पहले उनका ऐक्सिडेंट हुआ था जिसमें उनकी कलाई में चोट लगी थी। एक आर्थोपेडिस्ट की सलाह पर  एक्स रे और खून के टेस्ट सहित कई टेस्ट करने के बाद  पता चला कि अखिल को गठिया था। उनके रक्त में यूरिक एसिड का स्तर 9.1 mg/dL था जबकि सामान्य पुरुषों में यह  3-7 mg/dL और महिलाओं के लिए 2.5 mgmg/dL होना चाहिए। एक यूरिक एसिड का स्तर सामान्य से अधिक होता है जिसे हाइपररीसिमिया कहते हैं (खून में अतिरिक्त यूरिक एसिड)। जस्ट राईट ऑब्सिटी क्लीनिक, बंगलुरू  के संस्थापक डॉक्टर भारती एवी का कहना है, " गठिया और उच्च यूरिक एसिड संबंधित बीमारियों की घटनाएं विश्व स्तर पर बढ़ रही हैं, और यह संभवतः आहार और जीवनशैली में हालिया बदलावों के लिए जिम्मेदार है, और इससे लंबी उम्र भी बढ़ी है।" <blockquote class="twitter-tweet" data-lang="en"><p lang="hi" dir="ltr">श्रीमद् भागवद् गीता भारत का दुनिय...

पोखरण हमारा वह इतिहास है, जिसे याद कर हर भारतीय खुद को सम्मानित महसूस करेगा..!

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अटल बिहारी वाजपेयी को अबतक के हुए भारत के सभी प्रधानमंत्रियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय माना जाता है. उनकी नीति, बोलने का लहजा, विरोधियों से संवाद के तरीके सबसे अलग और सबसे जुदा होते  थे.  उनमें इतनी आत्मीयता होती थी की विपक्षी भी मंत्रमुग्ध हो जाते थे। 11 मई 1998 को पोखरन में दूसरा परमाणु परीक्षण किया गया था . ये परीक्षण इसलिए अहम था क्‍योंकि इसने पूरी दुनिया के सामने भारत की छवि को बदल कर रख दिया था . उस दिन दुनिया ने समझा कि  भारत तेजी से उभरता ताकत है . और इसके सूत्रधार कोई और नहीं बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ही थे। भारत के लिए यह परमाणु परीक्षण इतना आसान भी नहीं था क्योंकि अमेरिका हर पल नजर लगाए बैठा था. लेकिन बेहद चालाकी से भारतीय वैज्ञानिक और सेना ने इस काम को अंजाम दिए। इससे पहले 1974 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत के पहले परमाणु परीक्षण के लिए हरी झंडी दे दी। इसके लिए बी स्थान चुना गया था राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित छोटे से शहर पोखरण के निकट का रेगिस्तान और इस अभियान का नाम दिया गया मुस्कुराते बुद्ध। इस नाम को...

वो प्रधानमंत्री बनना चाहती है

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अब जिंदगी जैसी भी है ,है तो अपनी ही न क्यों भैया जी गलत बोल रहे हैं । चेहरे पर हल्की मुस्कान, आखों में पानी, किसी से कोई शिकायत नहीं. ये जो आदमी मेरे सामने बैठा है कहने को तो मौची है जूता सिलता है वो भी डिबिये की लौ में .हमने कहा भैया कल हैप्पी न्यू ईयर है उसने कहा क्या फर्क पड़ता है साहब, आम को करेला कहेंगे तो वो करेला थोड़े न हो जाएगा. वैसे भी बच्चे और बीवी तो गांव मे ही हैं बहुत करेंगे तो खीर-पूरी बना के खा लेंगे. अब बच्चे क्या करें, हैं तो इसी दुनियां मे न अमीरों को देखकर कभी-कभी वो भी पगला जाते हैं, उनके जैसे ही जश्न मनाने की जिद कर बैठते हैं अब उनको कौन समझाए ये सारी चीजें हमारी औकात से बाहर का है। वकील बेगूसराय जिले के रहने वाले हैं, जी पेशे वाले वकील नहीं हैं बस नाम वकील है इनका . गांव में आपको कलेक्टर साहेब भी मिल जाएंगे बस नाम के. शादी हो चूकी है बीवी बच्चे घर पर ही रहते हैं , कहते हैं यहाँ रखने से क्या फायदा है भैया. झूठ-मूठ का किराया उपर से खाना-पीना बच्चे की पढ़ाई बहुते लफड़ा है. वकील यहाँ वैशाली में सड़क किनारे अपना छोटा सा दुकान चलाते हैं जो रोज सुबह दस बजे...

बड़ा लोकतंत्र.., बड़ा तमाशा...!!

इस देश को राम के नाम से जाना जाता रहा है, बुद्ध के नाम से जाना जाता रहा है, अशोक महान  के नाम से जाना जाता रहा है लेकिन आज जिस नाम से जाना जाता है वो है यहाँ का लोकतंत्र. जी वही लोकतंत्र जिसकी पीठ पूरी दुनियां थपथपाती है, जो सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरता है, जिसकी आत्मा यहाँ की संसद मे बसती है, और संसद आज त्रस्त है, पस्त है..! आजादी के बाद बनी पहली सरकार के दौरान संसद में सर्वाधिक बैठकें हुईं थी जैसे-जैसे समय बीतता गया बैठकों का दौर भी कमता गया. सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद स्वाभाविक है और यह लोकतंत्र का एक अभिन्न हिस्सा है लेकिन यह गतिरोध नीतियों को लेकर , मुद्दों को लेकर, देशहित में हो तो जायज है लेकिन जब यह परस्पर मनमुटाव का कारण बन जाए, अपने –अपने हितों के लिए अगर संसद ठप किया जाए, देश की प्रगति के लिए तैयार मसौदा जब संसद पटल पर ही रखा रह जाए, तब उस मंदिर पर सवाल उठना लाजिमी है जिसे लोग संसद कहते हैं. निशाने पर वे पुजारी ही होंगे जिन्हें भारत की जनता ने इतनी बड़ी जिम्मेवारी सौंपी है.  संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र को देखकर संसदीय कार्य प्रणाली का भविष्य खतरे में...

शहर में होकर भी गांव होना

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आप जन्मजात अगर गाँव वाले हों, आपकी परवरिश, आपकी पढ़ाई, आपका रहन-सहन चलना-फिरना गँवार-सा है, तो एकदम से शहर मत आ जाना दूर से पहले तांका झांकी कर लेना क्योंकि शहर के अपने कायदे हैं, रहने सहने का तरीका है, अपना एक अलग मिजाज है, शहर के अंदर भी कई ऐसे शहर रचे-बसे हैं जो हमारे –आपके गांव से मीलों दूर हैं। हम भी पहली दफा शहर आये। गांव की सारी यादें लेकर , अल्हड़ दिमाग लेकर, सपने जैसा संसार लेकर ऐसा संसार जहाँ अब हम अकेले थे एक बड़े भैया थे जो अपने थे और जबतक उनके साथ रहता अपनेपन में जी रहा होता वो ऑफिस निकलते मैं अकेला हो जाता। लेकिन घर.. ! घर नहीं दो कमरे का रूम कहिए शहर में घर कहाँ होता है ? माफ कीजिएगा शायद दूसरों का होता हो पर मेरा नहीं था, आज भी नहीं है। हाँ केवल कनेक्शन था जो कि मेरे लिए बिल्कुल नया था. गांव में बिजली तो थी लेकिन वो आसमानों मे चमकने वाली बिजली की तरह चमक के चली जाती थी इसलिए पूरा दिन यहाँ सिनेमा मे रमा रहता । गांव मे सुना करता था कि दिल्ली के सिनेमा हॉल काफी पैसा वसूलते हैं लेकिन ऐसा नहीं लगा हमने पहली फिलम देखी 175 रूपैये में हमारे लिए तो मंहगी ही थी लेकिन किस...

कंसार: जहाँ आग भी जलती है, और औरत भी...!!

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केले की सूखी हुई पत्तियाँ, आस-पास दो-चार लड़की हाथ में सुप लिए हुए, बीच में बड़ा-सा एक चूल्हा जिसमें धू-धू कर आग जल रही है। उस आग की तपीश में बार-बार वो औरत अपने चेहरे को बचाने की कोशिश कर रही है या फिर उसी आग से खेल रही है समझ नहीं सका। हमारे गाँव में लोग इस जगह को कंसार कहते हैं जहाँ ऊँच-नीच सब आते हैं भुंजा (चावल,गेहूँ,चना, मक्का को आग पर रखे सुराही में लकड़ी से भूंजते हैं ) फॉकने  । मैं भी उस दिन चना ले के गया था। उसका नाम सागी वाली है, मैं ने उसका अपना वाला नाम पूछा तो कह बैठी बेटा अब तो यही अपना नाम है। गाँव के लोग उसको सागी वाली ( सागी हमारे यहाँ एक जगह का नाम है) ही कहते हैं, शायद हमारे गाँव का इकलौता जिंदा कंसार कहलीजिए या एक धूल फॉकती संस्कृति। यही कंसार उसका पूरा संसार है, यही उसकी रोटी है जितनी देर तक वो इस आग में जलती है रोटी भी उसी अनुपात में मिलता है, मानो उसको मिलने वाला हर रोटी ने आग में जलने की कसम खा रखी हो । और अब तो वहाँ आग भी कम जलती है ! इस फास्ट फूड के युग मे कौन कमबख्त वहाँ जाकर भुंजा फॉकें, कौन उस आग में जले । बाजार ने जिस हद तक शहर को अपनी बाँहो में सम...

अभी भी इतिहास की गोद बैठा है बिहार..!

जब भी बिहार  की बात की जाती है इसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को इससे अलग नही किया जाता है,यह दुहाई दी जाती है कि बिहार शुरू से ही एक संपन्न राज्य  रहा है, यहाँ अशोक जैसे महान राजा हुए हैं,, गौतम बुद्ध जैसे महात्मा ने इसी भूमि को अपना सबकुछ माना है, चाणक्य जैसे नीति- निर्माता की आत्मा  भी कभी इसी धरती मे बसती थी, ये सारी बातें सच हैं लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि यह सब एक अतीत है और अतीत को याद नही किया जाता है बल्कि उससे प्रेरणा लेकर अपने वर्तमान को इतना सुंदर और सरल बनाया जाता है कि हमारा आनेवाला कल हम पर गर्व महसूस करे और हमारा अतीत हमें देखकर इतराए, हमारी सुख, समृद्धि, हमारी सम्भावनाओं को देखकर हमसे जले। बिहार के संदर्भ मे कुछ ऐसा ही है बात चाहे राजनीति की हो या साहित्यिक उत्थान की हर जगह अतीत का ही उल्लेख किया जाता है या यूँ कहे अतीत का दंभ भरा जाता है और जो वर्तमान खाक मे मिल रहा है उस और किसी का ध्यान नहीं जाता न जनता का न ही किसी राजनेता का।  ये सच है कि आजादी के पहले बिहार  बंगाल की छाया मे जी रहा था पर भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत बिहार एक पूर्ण प्रशासन...