शहर में होकर भी गांव होना

आप जन्मजात अगर गाँव वाले हों, आपकी परवरिश, आपकी पढ़ाई, आपका रहन-सहन चलना-फिरना गँवार-सा है, तो एकदम से शहर मत आ जाना दूर से पहले तांका झांकी कर लेना क्योंकि शहर के अपने कायदे हैं, रहने सहने का तरीका है, अपना एक अलग मिजाज है, शहर के अंदर भी कई ऐसे शहर रचे-बसे हैं जो हमारे –आपके गांव से मीलों दूर हैं।

हम भी पहली दफा शहर आये। गांव की सारी यादें लेकर , अल्हड़ दिमाग लेकर, सपने जैसा संसार लेकर ऐसा संसार जहाँ अब हम अकेले थे एक बड़े भैया थे जो अपने थे और जबतक उनके साथ रहता अपनेपन में जी रहा होता वो ऑफिस निकलते मैं अकेला हो जाता। लेकिन घर..! घर नहीं दो कमरे का रूम कहिए शहर में घर कहाँ होता है ? माफ कीजिएगा शायद दूसरों का होता हो पर मेरा नहीं था, आज भी नहीं है। हाँ केवल कनेक्शन था जो कि मेरे लिए बिल्कुल नया था. गांव में बिजली तो थी लेकिन वो आसमानों मे चमकने वाली बिजली की तरह चमक के चली जाती थी इसलिए पूरा दिन यहाँ सिनेमा मे रमा रहता । गांव मे सुना करता था कि दिल्ली के सिनेमा हॉल काफी पैसा वसूलते हैं लेकिन ऐसा नहीं लगा हमने पहली फिलम देखी 175 रूपैये में हमारे लिए तो मंहगी ही थी लेकिन किसी ने एहसास न होने दिया. पापा को भी जानकारी नहीं थी, हो जाती तो बवाल मच जाता। वैसे बता दूँ कि मैं स्नातक करने दिल्ली आया था।

बड़ा अजीब सा लगता ये शहर दिल्ली, जो हमारे देश की राजधानी भी थी और जहाँ मैं फिलहाल तीन साल तो रहने वाला था ही. वो ऐसे कि दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में मेरा एडमिशन हुआ था। मेरी बारवीं तक की पढ़ाई गांव मे ही हुई. जब हम स्कूल जाते थे तो यह बात ध्यान रखनी पड़ती कि कोई लड़की हमारे आगे न चले, ऐसा गांव का फरमान न था लेकिन संस्कृति और परंपरा का टीका बिन बताए हमें लगा दिया गया था, अब असर तो दिखेगा न । तो जब भी कोई लड़की हमारे आगे होती हम भाग के पचास कदम आगे निकल जाते इससे संस्कृति की लाज भी बनी रहती और गांव की इज्जत भी. लड़का-लड़की एक साथ नहीं बैठते थे ये मास्टर साहब की सख्त हिदायत थी और स्कूल का अघोषित कानून भी. फिर भी कुछ शरारती लड़के खुलेआम इस कानून की धज्जियाँ उड़ाते. कभी बोर्ड पर किसी लड़के-लड़की का नाम लिखकर गुलाब का फोटो बना देते, कभी छुट्टी की घंटी बजते ही भीड़ बनकर किसी लड़की पर टूट जाते. स्कूल प्रशासन की तरफ से स्पस्टीकरण मांगा जाता और जो आरोपी साबित होते वो बुरी तरह से पिटते. कोई किसी से प्यार भी करता तो बोलता नहीं था. कभी किसी की नजरें भी मिल जाती थी तो दोनों प्यार ही समझते थे। चिट्ठीबाजी भी होती थी पर उतनी कारगर नहीं थी, पकड़े गए तो खैर नहीं । मुझे भी कुछ लड़की पसंद थी, पसंद का मतलब सीधे शादी और मुझे पता था साली शादी तो होगी नहीं. फिर भी जल्दबाजी में कभी देख लेता था लेकिन संभलकर क्योंकि गांव की इज्जत हमेशा नाक पर बैठी होती और परंपरा पिछुआरे में. ऊपर से जमींदार का लड़का, जमीन हॉलाकि कब की जा चूकी थी. बाबूजी सरकारी स्कूल मे मास्टर थे लेकिन लोग जबरदस्ती जमींदार ही बनाए हुए थे। और उस वक्त लड़की को देखना, उसे पसंद करना मतलब सीधे शादी से था. हम जो फिल्में देखते थे वो शुद्ध शाकाहारी हुआ करती थी, कहीं किसी सीन में हिरो हिरोइन को चुम्मा लेता तो हम सब असहज हो जाया करते. हम बाहर आके सोचते कि जरूर दोनों के बीच एक बड़ा सा शीशा रख दिया होगा तब हिरो ने चुम्मा लिया होगा. क्योंकि हम जहाँ रह रहे थे वहाँ कोई लड़का खुलेआम किसी लड़की को इत्मीनान से देख भी नहीं सकता और यहाँ इतने आराम से ...कैसे ?

दिल्ली आने के बाद बहुत कुछ नया देखा जैसे, कार चलाती लड़की, बीएमडबल्यू कार, छोटे कपड़ों मे लड़की, हमारी माँ किसी तरह सिग्नेचर कर लेती हैं और यहाँ उनकी उम्र की औरतें कार चला रहीं थी , कड़ाही पनीर, मटन टिक्का, चिली पनीर, पिज्जा, बर्गर, सब नया था मेरे लिए. हमारे यहाँ पनीर या तो शादियों में बनता था य़ा फिर शहर के होटलों में . इसलिए जब भी गांव में शादिय़ां होती एक जश्न सा माहौल होता हमारे लिए । कॉलेज का पहला दिन मेरे लिए उतना अच्छा नहीं था क्योंकि मैं तीन महीने लेट था.एक अलग माहौल था, लड़का-लड़की साथ बैठ बातें कर रहे थे, कहीं कोई लड़की तीन-चार लड़कों के बीच मटरगस्ती कर रही थी, कहीं अपने दोनों हाथ लड़के के कंधे पर रखकर उसपे हक जता रही थी. सच में मेरे तो होश उड़ गये, फिर एक क्षण लगा मैं भी तो अब यहीं का हूँ क्या बताऊं मन मे लड्डू नहीं रसगुल्ले फूटने लगे।

समय बीता जा रहा था , हम सेकेण्ड ईअर मे आ गये लेकिन अभी भी हम वैसे ही थे जैसे गांव से आये थे. मन में फूटा रसगुल्ला मन में ही सड़ गया। कभी हिम्मत ही न हुई किसी लड़की से बात करें जबकी यहाँ न तो कोई देखने वाला था न ही किसी तरह की परंपरा बंदूक ताने सामने खड़ी थी, जैसा जुनून नाटक को लेकर हमारे अंदर था, शहर आकर वो जुनून भी दम तोड़ गया । ऑडिसन का नाम सुनकर गया भी था लेकिन दरवाजे के बाहर से ही अंदर झांका तो कोई और ही दुनियां थी, हिम्मत ही न हुई अंदर जाने की. पता नहीं क्यों जबकी बड़ी शिद्दत से थियेटर करना चाहता था । खैर दो साल बीत गये इस साल भी ऑडिसन देने यह तय कर के गया कि अबकी तो अंदर जाना है खुद के हौसलों पर शायद उतना यकीं न था इसलिए एक दोस्त को जबरदस्ती साथ कर लिया. हम दोनों हॉल के बाहर आधे घंटे तक चक्कर लगाते रहे और यही सोचते रहें अंदर कैसे जाएं. तभी एक लड़की हॉल से निकल के जा रही थी मैं उसे जानता था पहले साल से, आज भी जानता हूँ. तीन साल के दौरान उससे बात करना तो दूर मैं उसके सामने आने से डरता था जबकी मैं चाहता था वो हमेशा मेरे सामने हों. आज भी मेरे सामने से वो जा रही थी फिर भी बात न कर सका जबकी आज बात करने का कारण भी था. मेरे दोस्त ने उसको टोका और पूछा ऑडिसन यहीं हो रहा है हाँ बोलते हुए उसने हम दोनों को दरवाजे तक छोर आई. मेरे लिए अच्छी बात ये थी कि वो चली गई. और मैं चाह भी रहा था वो यहाँ रहे भी.

कुछ हद तक अब बातें कर लेता हूँ जो अपने काम की है चाहे सामने कोई भी हो. आज भी पूरा शहर-सा होना चाहता हूँ कमबख्त ये गांव है कि पिछा ही नहीं छोड़ता, अब हमनें भी छोड़ दिया है य़ूँ शहर के पीछे भागना, यूँ शहर जैसा दिखना. इसका मतलब ये नही है कि शहर सुंदर नहीं होता, माशाअल्लाह शहर तो शानदार होता है !! पर अपनी आत्मा, अपनR रूह, अपना बचपन सब के सब गांव की ही मिट्टी में सने हैं, बने हैं. शायद इसीलिए मिट्टी का बना यह शरीर वहीं रहना चाहता है, वही मिटना चाहता है !!



Comments

Most Read

कंसार: जहाँ आग भी जलती है, और औरत भी...!!

तेरी कह के.................. लूंगा...!

कहाँ अकबर..कहाँ मोदी.. ?.....!