अभी भी इतिहास की गोद बैठा है बिहार..!
जब भी बिहार की बात की जाती है इसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को
इससे अलग नही किया जाता है,यह दुहाई दी जाती है कि बिहार शुरू से ही एक संपन्न
राज्य रहा है, यहाँ अशोक जैसे महान राजा
हुए हैं,, गौतम बुद्ध जैसे महात्मा ने इसी भूमि को अपना सबकुछ माना है, चाणक्य
जैसे नीति- निर्माता की आत्मा भी कभी इसी
धरती मे बसती थी, ये सारी बातें सच हैं लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि यह सब एक अतीत
है और अतीत को याद नही किया जाता है बल्कि उससे प्रेरणा लेकर अपने वर्तमान को इतना
सुंदर और सरल बनाया जाता है कि हमारा आनेवाला कल हम पर गर्व महसूस करे और हमारा
अतीत हमें देखकर इतराए, हमारी सुख, समृद्धि, हमारी सम्भावनाओं को देखकर हमसे जले।
बिहार के संदर्भ मे कुछ ऐसा
ही है बात चाहे राजनीति की हो या साहित्यिक उत्थान की हर जगह अतीत का ही उल्लेख
किया जाता है या यूँ कहे अतीत का दंभ भरा जाता है और जो वर्तमान खाक मे मिल रहा है
उस और किसी का ध्यान नहीं जाता न जनता का न ही किसी राजनेता का। ये सच है कि आजादी के पहले बिहार बंगाल की छाया मे जी रहा था पर भारत सरकार
अधिनियम 1935 के तहत बिहार एक पूर्ण प्रशासनिक राज्य के रूप मे आ गया और इसके पास संसाधन भी उस मात्रा मे उपलब्ध थे
जिनका अगर सही इस्तेमाल होता तो आज बिहार की राजनीति भी अलग होती और समाज भी।
लेकिन आजादी के बाद जिस तरह की राजनीति शुरू हुई और जैसा समाज बनाया गया उसी को
गोद मे लिए बिहार आज भी जल रहा है।
अभ हाल ही मे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रकवि दिनकर की
एक चिट्ठी का उल्लेख करते हुए कहा – “बिहार मे सत्ता कोई एक जाति के बल पर कभी किसी को नही मिलेगी और जबतक ऐसा सोच बना रहेगा
बिहार जलता रहेगा” बात सही है बिहार
मे क्या, कहीं भी कोई एक जाति किसी सरकार की कल्पना नहीं कर सकती जबतक की समाज के सभी वर्गों का समर्थन हासिल न
हो। एक बार फिर बिहार मे चुनाव होने जा रहे हैं, मीडिया से लेकर राजनेता हर कोई
तैयार है बहस हो रही है,
एक-दूसरे पर आरोप लगाए जा रहे हैं, विकास की बातें हो रही हैं और कहा जा रहा है बिहार अब जात-पात को पीछे छोरकर एक नए युग
मे प्रवेश कर रहा है। सभी लोग जानते हैं कि इस बार का आम चुनाव बिहार मे किस आधार पर लड़ा गया जाति के आधार पर या तथाकथित विकास के नाम पर।
सच्चाई तो ये है कि चुनाव से पहले हर चुनावी क्षेत्र का राजनीतिक तौर पर सर्वे
कराया जाता है और फिर यह निर्णय लिया जाता है कि वहाँ कौन सी जाति निर्णायक भूमिका
निभाएगी..? फिर उस जाति का प्रत्याशी घोषित किया
जाता है, बिहार मे राजनीति का यही गणित है।
लोगों
का एक बड़ा तबका मानता है कि आजादी के बाद बीस वर्षों तक सर्वणों ने राज किया,
उसके बाद बिहार की राजनीति मे लालू यादव एक नई सोच और नए तेवर के साथ आए जिनको
नीतीश का भी साथ मिला और राम विलास पासवन का भी। तीनो अपने को जेपी का चेला हर मंच पर बताते रहते हैं , आज तीनो अलग हैं, लालू और नीतीश साथ भी हैं तो महज नाम के
क्योंकि दोनो की अपनी महत्वाकांक्षए हैं जो की समय दर समय टकराती रहती हैं । इस
बार के चुनाव का सबसे अहम मुद्दा दलितों का है, उनके अधिकारों का है, उनके बीच का
ही एक नेता होने का है और वो नेता ‘मांझी’ के रूप मे दलित भी देख रहे हैं और राजनीतिक दिग्गज भी। लेकिन
इन सब के बीच केंन्द्र की मोदी सरकार भी बगूले की तरह बिहार चुनाव और इसके
समीकरणों पर नजर गराए है। मोदी विकास की बात कर रहे हैं और नीतीश भी अपने सुशासन
का राग गा रहे हैं। बुद्धिजीवीयों के एक वर्ग का मानना है कि बिहार की राजनीति मे
दुर्घटनाएं बहुत होती हैं कभी नेताओं के साथ तो कभी जनता के साथ, कभी जनता छली
जाती है तो कभी राजनेता अपने को ठगा महसूस करते हैं, अंतर इतना आया है कि जनता अब सर्तक हो गई है तो
नेता उतने ही चालाक। जितने भी राजनीतिक दल
हैं सभी अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं और बार-बार पूरी जनता को इतिहास बोध करा रहे
हैं कि देखो हम कितने महान थे.? लेकिन बदलते समय ने और नेताओं के झूटे वादों ने बिहार की
जनता को अतीत छोर वर्तमान मे जीना सिखा दिया।
इतिहास के
नाम पर पूरी बिहार की जनता को गर्व महसूस कराने वाले इन राजनीतिक दलों ने उनके
वर्तमान को हर दिन शर्मसार किया है, कभी मुस्लिम-यादव दंगे करवाकर तो कभी ब्राह्मण
को क्षत्रिय से लड़वाकर, कभी दलितों का खूलेआम कत्ल करने वाले रणवीर सेना जैसे
संगठनों को राजनीतिक पनाह देकर, कभी-कभी तो बिहार के इतिहास को खुद के होने पर
रोना आता होगा। इस बार का चुनाव इतिहास बदलने को नही न ही इतिहास बनाने को होगा
बल्कि वर्तमान जैसा भी है उसे आज से बेहतर बनाने का होगा, ताकि हमारा जो कल हो वो
हमारे आज पर इतराए, गर्व महसूस करे..! देखने वाली बात होगी कि जनता फिर से इतिहास की गोद मे ही
पलना चाहेगी य़ा फिर वर्तमान के साथ चलकर अपने भविष्य को गले लगाएगी ।
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