वो प्रधानमंत्री बनना चाहती है
अब जिंदगी जैसी भी है ,है
तो अपनी ही न क्यों भैया जी गलत बोल रहे हैं । चेहरे पर हल्की मुस्कान,
आखों में पानी, किसी से कोई शिकायत नहीं. ये जो आदमी मेरे सामने बैठा है कहने को
तो मौची है जूता सिलता है वो भी डिबिये की लौ में .हमने कहा भैया कल हैप्पी न्यू
ईयर है उसने कहा क्या फर्क पड़ता है साहब, आम को करेला कहेंगे तो वो करेला थोड़े न
हो जाएगा. वैसे भी बच्चे और बीवी तो गांव मे ही हैं बहुत करेंगे तो खीर-पूरी बना
के खा लेंगे. अब बच्चे क्या करें, हैं तो इसी दुनियां मे न अमीरों को देखकर
कभी-कभी वो भी पगला जाते हैं, उनके जैसे ही जश्न मनाने की जिद कर बैठते हैं अब
उनको कौन समझाए ये सारी चीजें हमारी औकात से बाहर का है।
वकील बेगूसराय जिले के रहने
वाले हैं, जी पेशे वाले वकील नहीं हैं बस नाम वकील है इनका . गांव में आपको कलेक्टर साहेब भी मिल जाएंगे बस नाम के. शादी
हो चूकी है बीवी बच्चे घर पर ही रहते हैं , कहते हैं यहाँ रखने से क्या फायदा है
भैया. झूठ-मूठ का किराया उपर से खाना-पीना बच्चे की पढ़ाई बहुते लफड़ा है. वकील
यहाँ वैशाली में सड़क किनारे अपना छोटा सा दुकान चलाते हैं जो रोज सुबह दस बजे
खुलती है और रात को आठ बजे बंद हो जाती है. न शटर गिराने का चक्कर न किसी प्रकार
का डर. एक डिबिया, जूता-चप्पल सीलने का
कुछ जरूरी सामान और स्ट्रीट लाईट वाली रौशनी जो बिन बुलाए उनकी छोटी सी झोपड़ी में
चली आती है, यही इनकी पूंजी है. भला आग और उजाले को भी कोई चुरा सकता है क्या..
वैसे भी शहर के चोरों का स्टैंडर अभी इतना भी नहीं गिरा है। हाँ डर तो लगता है कि
कहीं कोई रईसजादे की गाड़ी सौ की स्पीड मे हॉय से निकल गई तो उपर का छत्ता उड़ जाएगा
लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ है वकील हंसते हुए कहते हैं ।
बकौल वकील- जब कारगील युद्ध
चल रहा था उस वकत एक सैन्य अधिकारी से मेरी जान-पहचान थी काफी दिनों तक वो मेरे
पीछे पड़ा रहा पर मेरा मन कभी सेना में जाने का नहीं हुआ. सात साल की उम्र में
दिल्ली आया यह शख्स इन सब चीजों को मुक्कदर का खेल मानते हुए भूल चूका है और जिस
जिंदगी को जी रहा है उसी में खुश है। वकील का परिवार गांव में ही रहता है एक बेटी
दो बेटा है तीनों वहीं पढ़ते हैं. बेटी पढ़ने मे तेज है, वकील हंसते हुए कहता है
साहब जी वो प्रधानमंत्री बनना चाहती है बताओ साहब ये संभव है.. एकदम बावली है ।
हमारा समाज , हमारा गांव हर
नये साल मे नये तरीके से जश्न मनाता है बिल्कुल शहरों की तरह. अब गावं मे भी
बच्चों का हैप्पी बड्डे मनाया जाने लगा है, केक कटते हैं, मोमबत्ती बुझाते हुए अनपढ़
गंवार सब एक साथ एक सुर में बोलते हैं – हैप्पी बड्डे टू यू.. पिछली बार तो हमारे
पापा ने भी फोन कर के बड़े असहज होते हुए कहा – बेटा आज क्या कहते हैं सब वो
हैप्पी न्यू ईयर . मैं भी उतना ही असहज हो गया. सब कुछ बदल रहा है, पहनावा,
खान-पान, लेकिन जो कट्टर सोच है, परंपरा के नाम पर जो पुरानी सड़ी-गली चीजें हैं वो
नहीं बदल पाती। गांव में रह रहे चमार का ये तथाकथित पंडित लोग बहिस्कार करेंगे
लेकिन वही चमार जब आई.ए.स, आई.पी.एस बनकर इनके यहाँ आते हैं तो ये लोग उस वक्त
अपने भगवान को भी भूल जाते हैं, खूब स्वागत गान गाते हैं क्योंकि वहां इन लोगों का
काम बनता है। पाखंडी कहीं के !!
वकील बताते हैं – आप तो
जानते हैं साहेब इ धन्धा छोड़कर हम कोई दूसरा धंधा भी नहीं कर सकते मान लो किराने
का दुकान खोला तो सिर्फ हमारी बिरादरी के लोग ही सामान खरीदेंगे और हम लोग मुश्किल
से आठ से दस घर होंगे. यहाँ दिल्ली में कोई किसी का जात-धर्म नहीं पूछता लेकिन
हमारे पास उतनी पूंजी नहीं है कि यहाँ कुछ कर सके. और यहाँ ठिकाना भी बदलते रहता
है पहले जब दिल्ली आये थे तब जनकपूरी में सोलह साल रहे अब दस-बारह साल से हिय़ाँ
काम कर रहे हैं. जबतक हो सकता है बच्चा सब को पढ़ाएंगे नसीब में कुछ अच्छा लिखा
होगा तो कुछ बन जाएगा नहीं तो उपर वाले ने इ हुनर तो जन्मजात देवे किया है. मैंने
कहा बेटी प्रधानमंत्री बन गई तो उसने कंधेपर हाथ रखकर हंसते हुए कहा- नहीं इतना
आसान नहीं है हम कोई चाय वाले थोड़े न हैं जो देश माथे पर बैठा लेगा, हम चमार हैं
साहब इस देश का प्रधानमंत्री भी हमारी बेटी के हाथों टीका लगवाना नहीं चाहेगा. अभी
बच्ची है जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा उसकी समझ भी बढ़ती जाएगी. मैं उन्हें उतनी
सारी सुविधाएं नहीं दे पाता हूँ बस जान हमेशा हाजिर है उनके लिए. सोचता हूँ थोड़ा
पैसा होता तो एक छोटी कार में सब को घुमाता खैर... अब तो वही प्रधानमंत्री बने, सारे सपने पूरे हो जाएंगे
और लोग कहेंगे वो देखो प्रधानमंत्री का बाप
जूत्ता सी रहा है !! कल्पना कीजिए साहेब वो दिन एक बाप के लिए कितना बेमिसाल
होगा ..!!

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