काश...! दादी ने शहर की कहानी सुनाई होती
कहते हैं फिल्में समाज का दर्पण होती हैं मतलब समाज मे जो कुछ घटित होता है, समाज की जो भी असलियत है, जितनी संवेदना है , जैसी भी अवधारना है, फिल्में ठीक वैसी ही परोसती हैं । कभी-कभी तो हर आदमी की कहानी ही फिल्मी लगती है और लगता है ये “ फिलम ” वाले हमारे घरों से ही कहानियाँ चुराकर हमें परदे पर दिखाते हैं, हमे इस बात का अहसास कराते हैं कि देखो जिंदगी तुम्हारी ही है, हमने बस अपने जीने का तरीका तुम्हारी जिंदगी से सिखा है । हालांकि हम और आप यह भी नही कह सकते कि फलाना फिल्म हमारी जिंदगी पर बनी है क्योंकि ऐसे लाखो लोग हैं जो इस तरह की जिंदगी जी रहे हैं, । भारत की जितनी आबादी है और जितने लोग यहाँ रहते हैं इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह लोग यहाँ जीवन-यापन करते हैं,कैसे रहते हैं, ख्वाब देखना तो दूर अपने बच्चों के पेट कैसे पालते हैं ? स्वाभाविक है गाँव में रहने वाले लोग शहर इसलिए आते हैं ताकि वे अपनी जिंदगी सुधार सके, अपने बच्चों को भले कीमती खिलौने न दे पाएं पर उतनी शिक्षा और संस्कार अवश्य देकर जाए जितने मे उसका बच्चा इस शहर की असली सूरत पहचान ले और शहर मे रहना सिख जाए। ...