बड़ा लोकतंत्र.., बड़ा तमाशा...!!

इस देश को राम के नाम से जाना जाता रहा है, बुद्ध के नाम से जाना जाता रहा है, अशोक महान  के नाम से जाना जाता रहा है लेकिन आज जिस नाम से जाना जाता है वो है यहाँ का लोकतंत्र. जी वही लोकतंत्र जिसकी पीठ पूरी दुनियां थपथपाती है, जो सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरता है, जिसकी आत्मा यहाँ की संसद मे बसती है, और संसद आज त्रस्त है, पस्त है..!
आजादी के बाद बनी पहली सरकार के दौरान संसद में सर्वाधिक बैठकें हुईं थी जैसे-जैसे समय बीतता गया बैठकों का दौर भी कमता गया. सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद स्वाभाविक है और यह लोकतंत्र का एक अभिन्न हिस्सा है लेकिन यह गतिरोध नीतियों को लेकर , मुद्दों को लेकर, देशहित में हो तो जायज है लेकिन जब यह परस्पर मनमुटाव का कारण बन जाए, अपने –अपने हितों के लिए अगर संसद ठप किया जाए, देश की प्रगति के लिए तैयार मसौदा जब संसद पटल पर ही रखा रह जाए, तब उस मंदिर पर सवाल उठना लाजिमी है जिसे लोग संसद कहते हैं. निशाने पर वे पुजारी ही होंगे जिन्हें भारत की जनता ने इतनी बड़ी जिम्मेवारी सौंपी है.  संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र को देखकर संसदीय कार्य प्रणाली का भविष्य खतरे में दिख रहा है. 26 नवंबर से शुरू हुए इस सत्र के दैरान केवल 20 बैठकें हुई. व्यवधानों और गतिरोधों के कारण तकरीबन आठ घंटे का समय़ बर्बाद हुआ इन सब के बीच मात्र तेरह विधयकों को मंजूरी दी गई.
सरकार पूरे देश की होती है, देशहित में काम करती है लेकिन उसके काम करने के तरीके होते हैं कुछ प्रावधान होता है जो कि कानून के जरिए संसद मे बनता है और संसद किसी की बपौती नहीं जो संसद को ठप कर दिया जाए व्यक्तिगत राजनीतिक आकांक्षाओं के लिए. नेता राजनीति कर के संसद मे आते हैं यह अच्छी बात है लेकिन यही लोग जब संसद मे राजनीति करने लगते हैं, नीतियों को लेकर मोल-भाव करने लगते हैं, बेवजह चिल्लाते हैं जिससे संसद बाधित हो और सदन के स्थगन के बाद संसद के कैंटीन का सस्ता खाना डकारते हुए निकल लेते हैं. तब सवाल संसद को लेकर उठता है, जनता सैलाब बनकर सड़क पर उतरती है, पुलिस पानी के फव्वारे छोड़ती है, गोलियां चलाती है, अंत में खादी पहने नेता जी अपनी आंखों मे किराए का आँसू लाते हुए कहते हैं, लोकतंत्र आहत हुआ है.
संसद के इस सत्र में कांग्रेस का रवैया परेशान करने वाला है. अपने को सबसे पुरानी और संवैधानिक कहने वाली पार्टी आज सदन में संवैधानिक संकट खड़ी कर रही है. एक विपक्ष का काम सार्थक बहस को उसके अंजाम तक पहुंचाना है न की बार-बार किसी मुद्दे को लेकर स्पीकर के सामने हल्ला मचाना, बहस न होने देना. सत्र के शुरूआत मे असहिष्णुता और बहुसंख्यकवाद का मुद्दा छाया रहा और भाजपा बहस के लिए तैयार भी हुई फिर भी निरंतर इसी मुद्दे पर गतिरोध कायम रहा और संसद ठप रही।
इस समय ऐसे उन्नीस बिल हैं जिन्हे पास होना है और चौदह नये बिल सदन के पटल पर रखा जाना है. हालांकि संसदीय मामलों पर नजर रखने वाली संस्था पीआरएस लेजिशलेटिव ने संसद की रचनात्मकता पर कुछ सकारात्मक आकड़ें पेश किए हैं. चार महीने के लंबे बैठकों के दौरान, भारत के निचले सदन मे वास्तविक कार्य करने के दर मे 123% की वृद्धि देखी गई जो कि पिछले पन्द्रह साल के दौरान सबसे अधिक देखी गई है. वहीं उपरी सदन में 101% की बढ़ोतरी देखी गई. इस सत्र के दौरान वित्तीय कारोबार के लिए बहुत कुछ किया गया, राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर भी बहस की गई ऐसा पीआरएस विधायी अनुसंधान में आउटरीच के प्रमुख चसकु रॉय का कहना है. लैंड बिल और जीएसटी बिल पर कई क्षेत्रिय दलों की सहमती के बावजूद भाजपा इसे पारित नहीं करवा पाई क्योंकि कांग्रेस का रवैया इसके सख्त खिलाफ है।

संसद के इस गतिरोध में जनता का बुरा हाल है क्योंकि हमें पता है कि संसद के एक दिन की कार्यपद्धति पर कितना खर्च आता है, और ये खर्च किसी सांसद के पॉकेट या किसी राष्ट्रीय पार्टी के बैंक खाते से नहीं बल्कि अरबों जनता के खून-पसीने की मेहनत से आता है। इसलिए कानून बनाने वालों को हमेशा यह याद रखना होगा कि ये जो संसद है वहां के सिर्फ ये किराएदार हैं, सलीके से पेश आएं और इमानदारी से काम करें नहीं तो बाहर निकाल दिए जाएंगे, क्योंकि हम यहाँ के मालिक हैं और जिस गुंबद में आप बेवजह चिल्लाते हो वह मकान हमारा है। 

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