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Showing posts from December, 2015

वो प्रधानमंत्री बनना चाहती है

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अब जिंदगी जैसी भी है ,है तो अपनी ही न क्यों भैया जी गलत बोल रहे हैं । चेहरे पर हल्की मुस्कान, आखों में पानी, किसी से कोई शिकायत नहीं. ये जो आदमी मेरे सामने बैठा है कहने को तो मौची है जूता सिलता है वो भी डिबिये की लौ में .हमने कहा भैया कल हैप्पी न्यू ईयर है उसने कहा क्या फर्क पड़ता है साहब, आम को करेला कहेंगे तो वो करेला थोड़े न हो जाएगा. वैसे भी बच्चे और बीवी तो गांव मे ही हैं बहुत करेंगे तो खीर-पूरी बना के खा लेंगे. अब बच्चे क्या करें, हैं तो इसी दुनियां मे न अमीरों को देखकर कभी-कभी वो भी पगला जाते हैं, उनके जैसे ही जश्न मनाने की जिद कर बैठते हैं अब उनको कौन समझाए ये सारी चीजें हमारी औकात से बाहर का है। वकील बेगूसराय जिले के रहने वाले हैं, जी पेशे वाले वकील नहीं हैं बस नाम वकील है इनका . गांव में आपको कलेक्टर साहेब भी मिल जाएंगे बस नाम के. शादी हो चूकी है बीवी बच्चे घर पर ही रहते हैं , कहते हैं यहाँ रखने से क्या फायदा है भैया. झूठ-मूठ का किराया उपर से खाना-पीना बच्चे की पढ़ाई बहुते लफड़ा है. वकील यहाँ वैशाली में सड़क किनारे अपना छोटा सा दुकान चलाते हैं जो रोज सुबह दस बजे...

बड़ा लोकतंत्र.., बड़ा तमाशा...!!

इस देश को राम के नाम से जाना जाता रहा है, बुद्ध के नाम से जाना जाता रहा है, अशोक महान  के नाम से जाना जाता रहा है लेकिन आज जिस नाम से जाना जाता है वो है यहाँ का लोकतंत्र. जी वही लोकतंत्र जिसकी पीठ पूरी दुनियां थपथपाती है, जो सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरता है, जिसकी आत्मा यहाँ की संसद मे बसती है, और संसद आज त्रस्त है, पस्त है..! आजादी के बाद बनी पहली सरकार के दौरान संसद में सर्वाधिक बैठकें हुईं थी जैसे-जैसे समय बीतता गया बैठकों का दौर भी कमता गया. सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद स्वाभाविक है और यह लोकतंत्र का एक अभिन्न हिस्सा है लेकिन यह गतिरोध नीतियों को लेकर , मुद्दों को लेकर, देशहित में हो तो जायज है लेकिन जब यह परस्पर मनमुटाव का कारण बन जाए, अपने –अपने हितों के लिए अगर संसद ठप किया जाए, देश की प्रगति के लिए तैयार मसौदा जब संसद पटल पर ही रखा रह जाए, तब उस मंदिर पर सवाल उठना लाजिमी है जिसे लोग संसद कहते हैं. निशाने पर वे पुजारी ही होंगे जिन्हें भारत की जनता ने इतनी बड़ी जिम्मेवारी सौंपी है.  संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र को देखकर संसदीय कार्य प्रणाली का भविष्य खतरे में...

शहर में होकर भी गांव होना

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आप जन्मजात अगर गाँव वाले हों, आपकी परवरिश, आपकी पढ़ाई, आपका रहन-सहन चलना-फिरना गँवार-सा है, तो एकदम से शहर मत आ जाना दूर से पहले तांका झांकी कर लेना क्योंकि शहर के अपने कायदे हैं, रहने सहने का तरीका है, अपना एक अलग मिजाज है, शहर के अंदर भी कई ऐसे शहर रचे-बसे हैं जो हमारे –आपके गांव से मीलों दूर हैं। हम भी पहली दफा शहर आये। गांव की सारी यादें लेकर , अल्हड़ दिमाग लेकर, सपने जैसा संसार लेकर ऐसा संसार जहाँ अब हम अकेले थे एक बड़े भैया थे जो अपने थे और जबतक उनके साथ रहता अपनेपन में जी रहा होता वो ऑफिस निकलते मैं अकेला हो जाता। लेकिन घर.. ! घर नहीं दो कमरे का रूम कहिए शहर में घर कहाँ होता है ? माफ कीजिएगा शायद दूसरों का होता हो पर मेरा नहीं था, आज भी नहीं है। हाँ केवल कनेक्शन था जो कि मेरे लिए बिल्कुल नया था. गांव में बिजली तो थी लेकिन वो आसमानों मे चमकने वाली बिजली की तरह चमक के चली जाती थी इसलिए पूरा दिन यहाँ सिनेमा मे रमा रहता । गांव मे सुना करता था कि दिल्ली के सिनेमा हॉल काफी पैसा वसूलते हैं लेकिन ऐसा नहीं लगा हमने पहली फिलम देखी 175 रूपैये में हमारे लिए तो मंहगी ही थी लेकिन किस...

कंसार: जहाँ आग भी जलती है, और औरत भी...!!

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केले की सूखी हुई पत्तियाँ, आस-पास दो-चार लड़की हाथ में सुप लिए हुए, बीच में बड़ा-सा एक चूल्हा जिसमें धू-धू कर आग जल रही है। उस आग की तपीश में बार-बार वो औरत अपने चेहरे को बचाने की कोशिश कर रही है या फिर उसी आग से खेल रही है समझ नहीं सका। हमारे गाँव में लोग इस जगह को कंसार कहते हैं जहाँ ऊँच-नीच सब आते हैं भुंजा (चावल,गेहूँ,चना, मक्का को आग पर रखे सुराही में लकड़ी से भूंजते हैं ) फॉकने  । मैं भी उस दिन चना ले के गया था। उसका नाम सागी वाली है, मैं ने उसका अपना वाला नाम पूछा तो कह बैठी बेटा अब तो यही अपना नाम है। गाँव के लोग उसको सागी वाली ( सागी हमारे यहाँ एक जगह का नाम है) ही कहते हैं, शायद हमारे गाँव का इकलौता जिंदा कंसार कहलीजिए या एक धूल फॉकती संस्कृति। यही कंसार उसका पूरा संसार है, यही उसकी रोटी है जितनी देर तक वो इस आग में जलती है रोटी भी उसी अनुपात में मिलता है, मानो उसको मिलने वाला हर रोटी ने आग में जलने की कसम खा रखी हो । और अब तो वहाँ आग भी कम जलती है ! इस फास्ट फूड के युग मे कौन कमबख्त वहाँ जाकर भुंजा फॉकें, कौन उस आग में जले । बाजार ने जिस हद तक शहर को अपनी बाँहो में सम...