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वो प्रधानमंत्री बनना चाहती है

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अब जिंदगी जैसी भी है ,है तो अपनी ही न क्यों भैया जी गलत बोल रहे हैं । चेहरे पर हल्की मुस्कान, आखों में पानी, किसी से कोई शिकायत नहीं. ये जो आदमी मेरे सामने बैठा है कहने को तो मौची है जूता सिलता है वो भी डिबिये की लौ में .हमने कहा भैया कल हैप्पी न्यू ईयर है उसने कहा क्या फर्क पड़ता है साहब, आम को करेला कहेंगे तो वो करेला थोड़े न हो जाएगा. वैसे भी बच्चे और बीवी तो गांव मे ही हैं बहुत करेंगे तो खीर-पूरी बना के खा लेंगे. अब बच्चे क्या करें, हैं तो इसी दुनियां मे न अमीरों को देखकर कभी-कभी वो भी पगला जाते हैं, उनके जैसे ही जश्न मनाने की जिद कर बैठते हैं अब उनको कौन समझाए ये सारी चीजें हमारी औकात से बाहर का है। वकील बेगूसराय जिले के रहने वाले हैं, जी पेशे वाले वकील नहीं हैं बस नाम वकील है इनका . गांव में आपको कलेक्टर साहेब भी मिल जाएंगे बस नाम के. शादी हो चूकी है बीवी बच्चे घर पर ही रहते हैं , कहते हैं यहाँ रखने से क्या फायदा है भैया. झूठ-मूठ का किराया उपर से खाना-पीना बच्चे की पढ़ाई बहुते लफड़ा है. वकील यहाँ वैशाली में सड़क किनारे अपना छोटा सा दुकान चलाते हैं जो रोज सुबह दस बजे...

बड़ा लोकतंत्र.., बड़ा तमाशा...!!

इस देश को राम के नाम से जाना जाता रहा है, बुद्ध के नाम से जाना जाता रहा है, अशोक महान  के नाम से जाना जाता रहा है लेकिन आज जिस नाम से जाना जाता है वो है यहाँ का लोकतंत्र. जी वही लोकतंत्र जिसकी पीठ पूरी दुनियां थपथपाती है, जो सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरता है, जिसकी आत्मा यहाँ की संसद मे बसती है, और संसद आज त्रस्त है, पस्त है..! आजादी के बाद बनी पहली सरकार के दौरान संसद में सर्वाधिक बैठकें हुईं थी जैसे-जैसे समय बीतता गया बैठकों का दौर भी कमता गया. सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद स्वाभाविक है और यह लोकतंत्र का एक अभिन्न हिस्सा है लेकिन यह गतिरोध नीतियों को लेकर , मुद्दों को लेकर, देशहित में हो तो जायज है लेकिन जब यह परस्पर मनमुटाव का कारण बन जाए, अपने –अपने हितों के लिए अगर संसद ठप किया जाए, देश की प्रगति के लिए तैयार मसौदा जब संसद पटल पर ही रखा रह जाए, तब उस मंदिर पर सवाल उठना लाजिमी है जिसे लोग संसद कहते हैं. निशाने पर वे पुजारी ही होंगे जिन्हें भारत की जनता ने इतनी बड़ी जिम्मेवारी सौंपी है.  संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र को देखकर संसदीय कार्य प्रणाली का भविष्य खतरे में...

शहर में होकर भी गांव होना

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आप जन्मजात अगर गाँव वाले हों, आपकी परवरिश, आपकी पढ़ाई, आपका रहन-सहन चलना-फिरना गँवार-सा है, तो एकदम से शहर मत आ जाना दूर से पहले तांका झांकी कर लेना क्योंकि शहर के अपने कायदे हैं, रहने सहने का तरीका है, अपना एक अलग मिजाज है, शहर के अंदर भी कई ऐसे शहर रचे-बसे हैं जो हमारे –आपके गांव से मीलों दूर हैं। हम भी पहली दफा शहर आये। गांव की सारी यादें लेकर , अल्हड़ दिमाग लेकर, सपने जैसा संसार लेकर ऐसा संसार जहाँ अब हम अकेले थे एक बड़े भैया थे जो अपने थे और जबतक उनके साथ रहता अपनेपन में जी रहा होता वो ऑफिस निकलते मैं अकेला हो जाता। लेकिन घर.. ! घर नहीं दो कमरे का रूम कहिए शहर में घर कहाँ होता है ? माफ कीजिएगा शायद दूसरों का होता हो पर मेरा नहीं था, आज भी नहीं है। हाँ केवल कनेक्शन था जो कि मेरे लिए बिल्कुल नया था. गांव में बिजली तो थी लेकिन वो आसमानों मे चमकने वाली बिजली की तरह चमक के चली जाती थी इसलिए पूरा दिन यहाँ सिनेमा मे रमा रहता । गांव मे सुना करता था कि दिल्ली के सिनेमा हॉल काफी पैसा वसूलते हैं लेकिन ऐसा नहीं लगा हमने पहली फिलम देखी 175 रूपैये में हमारे लिए तो मंहगी ही थी लेकिन किस...

कंसार: जहाँ आग भी जलती है, और औरत भी...!!

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केले की सूखी हुई पत्तियाँ, आस-पास दो-चार लड़की हाथ में सुप लिए हुए, बीच में बड़ा-सा एक चूल्हा जिसमें धू-धू कर आग जल रही है। उस आग की तपीश में बार-बार वो औरत अपने चेहरे को बचाने की कोशिश कर रही है या फिर उसी आग से खेल रही है समझ नहीं सका। हमारे गाँव में लोग इस जगह को कंसार कहते हैं जहाँ ऊँच-नीच सब आते हैं भुंजा (चावल,गेहूँ,चना, मक्का को आग पर रखे सुराही में लकड़ी से भूंजते हैं ) फॉकने  । मैं भी उस दिन चना ले के गया था। उसका नाम सागी वाली है, मैं ने उसका अपना वाला नाम पूछा तो कह बैठी बेटा अब तो यही अपना नाम है। गाँव के लोग उसको सागी वाली ( सागी हमारे यहाँ एक जगह का नाम है) ही कहते हैं, शायद हमारे गाँव का इकलौता जिंदा कंसार कहलीजिए या एक धूल फॉकती संस्कृति। यही कंसार उसका पूरा संसार है, यही उसकी रोटी है जितनी देर तक वो इस आग में जलती है रोटी भी उसी अनुपात में मिलता है, मानो उसको मिलने वाला हर रोटी ने आग में जलने की कसम खा रखी हो । और अब तो वहाँ आग भी कम जलती है ! इस फास्ट फूड के युग मे कौन कमबख्त वहाँ जाकर भुंजा फॉकें, कौन उस आग में जले । बाजार ने जिस हद तक शहर को अपनी बाँहो में सम...

अभी भी इतिहास की गोद बैठा है बिहार..!

जब भी बिहार  की बात की जाती है इसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को इससे अलग नही किया जाता है,यह दुहाई दी जाती है कि बिहार शुरू से ही एक संपन्न राज्य  रहा है, यहाँ अशोक जैसे महान राजा हुए हैं,, गौतम बुद्ध जैसे महात्मा ने इसी भूमि को अपना सबकुछ माना है, चाणक्य जैसे नीति- निर्माता की आत्मा  भी कभी इसी धरती मे बसती थी, ये सारी बातें सच हैं लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि यह सब एक अतीत है और अतीत को याद नही किया जाता है बल्कि उससे प्रेरणा लेकर अपने वर्तमान को इतना सुंदर और सरल बनाया जाता है कि हमारा आनेवाला कल हम पर गर्व महसूस करे और हमारा अतीत हमें देखकर इतराए, हमारी सुख, समृद्धि, हमारी सम्भावनाओं को देखकर हमसे जले। बिहार के संदर्भ मे कुछ ऐसा ही है बात चाहे राजनीति की हो या साहित्यिक उत्थान की हर जगह अतीत का ही उल्लेख किया जाता है या यूँ कहे अतीत का दंभ भरा जाता है और जो वर्तमान खाक मे मिल रहा है उस और किसी का ध्यान नहीं जाता न जनता का न ही किसी राजनेता का।  ये सच है कि आजादी के पहले बिहार  बंगाल की छाया मे जी रहा था पर भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत बिहार एक पूर्ण प्रशासन...

काश...! दादी ने शहर की कहानी सुनाई होती

कहते हैं फिल्में समाज का दर्पण होती हैं मतलब समाज मे जो कुछ घटित होता है, समाज की जो भी असलियत है, जितनी संवेदना है , जैसी भी अवधारना  है, फिल्में ठीक वैसी ही परोसती हैं । कभी-कभी तो हर आदमी की कहानी ही फिल्मी लगती है और लगता है ये “ फिलम ” वाले हमारे घरों से ही कहानियाँ चुराकर हमें परदे पर दिखाते हैं, हमे इस बात का अहसास कराते हैं कि देखो जिंदगी तुम्हारी ही है, हमने बस अपने जीने का तरीका तुम्हारी जिंदगी से सिखा है । हालांकि हम और आप यह भी नही कह सकते कि फलाना फिल्म हमारी जिंदगी पर बनी है क्योंकि ऐसे लाखो लोग हैं जो इस तरह की जिंदगी जी रहे हैं, । भारत की जितनी आबादी है और जितने लोग यहाँ रहते हैं इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह लोग यहाँ जीवन-यापन करते हैं,कैसे रहते हैं, ख्वाब देखना तो दूर अपने बच्चों के पेट कैसे पालते हैं ?  स्वाभाविक है गाँव में रहने वाले लोग शहर इसलिए आते हैं ताकि वे अपनी जिंदगी सुधार सके, अपने बच्चों को भले कीमती खिलौने न दे पाएं पर उतनी शिक्षा और संस्कार अवश्य देकर जाए जितने मे उसका बच्चा इस शहर की असली सूरत पहचान ले और शहर मे रहना सिख जाए। ...

मुख्यमंत्री होना भी "जंग" है

दिल्ली के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच चल रही तकरार के मायने और इससे होने वाले नुकसान का तकाजा समझना अभी मुश्किल है जबतक कि इन दोनो से जुड़े कानूनी दाव-पेंच को ठीक से समझ न लिया जाए। मालूम हो कि दिल्ली सरकार को वो सारे अधिकार प्राप्त नही हैं जो कि अन्य भारतीय राज्यों को मिले हुए हैं इस कारण केजरीवाल सरकार ही इसका अपवाद नही है बल्कि पिछली सरकारों का भी केन्द्र के साथ तकरार होता रहा है। इस वक्त नजीब जंग उपराज्यपाल हैं और पिछे हटने के मूड मे नही हैं केजरीवाल के हर फैसले को पलट कर वे इस बात को बार-बार जता भी रहे हैं। देखा जाए तो जंग और केजरीवाल दोनो ही पूर्व नौकरशाह रह चूके हैं और दोनो ने कुछ साल नौकरी करने के बाद अपने लिए अलग-अलग रास्ते चूने हैं आज जब दोनो एक दूसरे के सामने हैं तो इनके अधिकार इनकी तकरार का कारण बन रही है। जैसा कि हम जानते हैं दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नही प्राप्त है परंतु एक संविधान संशोधन के जरिए दिल्ली और पांडीचेरी को अन्य केन्द्रशासित प्रदेशों से परे विशेष दर्जा हासिल है। दिल्ली की अपनी विधानसभा है और कुछ विषयों को छोरकर जैसे कानून-व्यवस्था और भूमि से जुड़े ...