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हाय रे देशभक्ति ...जो रे अच्छे दिनों के मालिक..!

जिस तरह समंदर का मिजाज कोई नही भॉप पाता है कि कौन सी कश्ती किनारे को लगेगी और कौन सी समंदर मे ही डूब जाएगी उसी तरह इसकी क्या गारंटी है कि आजादी के बाद पैदा लेने वाला हर भारतीय देशभक्त ही हो....? । खैर चलो आज - कल मे हम हिन्दुस्तानी बन जाते हैं बाकी साल भर तो हिन्दू-मुस्लिम, दंगा-फसाद, दलित- ब्राह्मण चलता ही रहता है। साल भर मस्त-मौला मस्त कलंडर सुनते रहेंगे लेकिन आजकल. ऐ मेरे वतन के लोगो, हम कसम ख ाते हैं कि रंग दे बसंती चोला ही गाएंगे पता नही क्यूँ बसंती चोला को इन्हीं दिनों रंगने की आरजू जगती है । पूरे साल मलाई मारका, स्पंज अपने तोंद मे डालेंगे लेकिन आजकल मे जलेबी पर जान मटकाएगें। वो मधुमक्ख्ियाँ जो साल भर जलेबी को लेकर जश्न मनाती है,गुनगुनाती है,गीत गाती है उसकी देशभक्ति बड़ी या हमारी क्षूद्रभक्ति.......??......... ..जनहित मे जारी..जागो देशभक्त जागो...!

कहाँ अकबर..कहाँ मोदी.. ?.....!

जब हुमायूं बीकानेर से भाग रहा था उन्ही दिनों 15 अक्टूबर 1542 को जन्में जलालुद्दीन मुम्मद अकबर का जीवन जोखिमों से भरा हुआ था जब वह केवल एक साल का था । हुमायूं को कामरान द्वारा बन्दी बना लिए जाने से बचने के लिए अपने दुधमुंहे बच्चे को छोड़कर ईरान भागना पड़ा । शुरूआत मे कामरान ने अकबर की अच्छी देखभाल की बाद मे मन मे खोट आया और हिन्दुस्तान के भावी नन्हें शहंशाह को उसने आग उगलती तोपों की जद मे पड़ने वाले परकोटे पर रख दिया ।                                     पर कुछ लोग पैदा होने से पहले ही ऊपरवाले से करार करवा लेते हैं कि हमें इतने दिनों तक जीना है और अपनी विरासत को आगे ले जाना है अकबर इन्हीं में से एक था । वहीं आज के किसी नेता के पतलून के नीचे कोई पटाखा छोर दो तो हार्ट अटैक से प्राण चली जाती है इनकी तकदीर ऊपरवाले ने अगर ठीक-ठाक लिख भी दी हो तो भी इनकी मक्कारी और इनकी चाल-चलन इनकी जान ले ही लेती है । अकबर ने जब ...

तेरी कह के.................. लूंगा...!

जिस तरह भगवान को अपने भक्तों पर नाज है, समंदर अपनी लहरो को देखकर मचलती है जरा सोचिये अगर भक्त भगवान के खिलाफ हो जाए, लहरें समंदर से इत्तिफाक न रखे तो क्या होगा ? शायद तब समंदर का अस्तित्व ही न रहें और भगवान अपने वजूद को लेकर सोच में पड़ जाएंगे। भारत के राजनीतिक गलियारे मे आज एक आम आदमी की हालत कुछ इसी तरह है मानो वो नेता बनकर राजनीति से ही बगावत कर बैठा है वही राजनीति जिसमें अधिकांश राजनेता अपने चारों धाम देखते हैं, इसी की खाते हैं और इसी की मक्कारी से जनता की लेते हैं ।                              अरविंद केजरीवाल का राजनीति मे आना ही भारत के इतिहास मे एक अहम अध्याय बन गया है इसलिए नहीं कि यहाँ से एक नई राजनीति की शुरूआत हुई है बल्कि इसलिए कि ज्यादातर स्थापित नेताओं की राजनीति बदलने लगी है । भले ही अरविंद केजरीवाल को कोई राजनीतिक पार्टी सामने से चुनौती नही मान रही हो लेकिन अंदर ही अंदर सबकी फटी पड़ी है । अरविंद भी इस बात को जान गए और राज...

तुम भूल गये.....कुछ सत्ता है नारी की...!

"तुम भूल गये पुरूषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की" संभवत: जयशंकर प्रसाद ने यह पंक्ति तब लिखी होगी जब नारी का समाज मे कोई स्थान नहीं था,तभी वो उस दौर मे नारी के लिए कुछ सत्ता की मांग उस सामंतवादी समाज से कर रहे थे । लेकिन आज इस दौर मे समाज भी बदला है और कुछ हद तक नारी को सत्ता भी मिली है, फिर भी स्थिति पहले से भयानक है। कल तक औरत को औरत समझा जाता था तभी सत्ता दिलाने की बात होती थी आज तो औरत "औरत" ही न रही।                                                                                                                                                                         ...