तेरी कह के.................. लूंगा...!
जिस तरह भगवान को
अपने भक्तों पर नाज है, समंदर अपनी लहरो को देखकर मचलती है जरा सोचिये अगर भक्त
भगवान के खिलाफ हो जाए, लहरें समंदर से इत्तिफाक न रखे
तो क्या होगा ? शायद तब समंदर का अस्तित्व ही न रहें और भगवान
अपने वजूद को लेकर सोच में पड़ जाएंगे। भारत के राजनीतिक गलियारे मे आज एक आम आदमी
की हालत कुछ इसी तरह है मानो वो नेता बनकर राजनीति से ही बगावत कर बैठा है वही
राजनीति जिसमें अधिकांश राजनेता अपने चारों धाम देखते हैं, इसी की खाते हैं और इसी
की मक्कारी से जनता की लेते हैं ।
अरविंद केजरीवाल का
राजनीति मे आना ही भारत के इतिहास मे एक अहम अध्याय बन गया है इसलिए नहीं कि यहाँ
से एक नई राजनीति की शुरूआत हुई है बल्कि इसलिए कि ज्यादातर स्थापित नेताओं की
राजनीति बदलने लगी है । भले ही अरविंद केजरीवाल को कोई राजनीतिक पार्टी सामने से
चुनौती नही मान रही हो लेकिन अंदर ही अंदर सबकी फटी पड़ी है । अरविंद भी इस बात को
जान गए और राजनीति के दाँव-पेंच से इतर अनोखे अंदाज मे स्टंटबाजी करने लगे ताकि मीडिया से लेकर राजनेता और इस देश की आम जनता हमेशा उन्हें देखती और सुनती रहे ।
अक्सर क्या होता है कि जब आप साख बनाते हैं तो ये जरूरी नहीं कि आपकी साख हमेशा
बनी रहे कहीं आगे अगर आपकी साख गिरती भी है तो लोग भले आपका साथ न दे पर कहीं न
कहीं आपको याद जरूर रखते हैं । निश्चित रूप से केजरीवाल की साख गिरी है। पर लोगों
के जेहन में वे अभी बने हैं। खुद आम आदमी पार्टी के अंदर भी कलह मची, बगावतें हुई,
कुछ दिनों तक आरोप-प्रत्यारोप की बारिशें भी होती रहीं । यहीं केजरीवाल कमजोर दिखे
पर मिटे नहीं । इसी बीच मीडिया के खिलाफ उनका क्रांतिकारी बयान आया और मीडिया बाढ़
के पानी जैसी उफनती हुई सैलाब बनकर उनपर टूट पड़ी ।
हालाकि केजरीवाल
अपने बयान से पलटे पर मीडिया कहाँ रूकने वाली थी। मीडिया को तो इस बात का भी गुमान
रहा है कि हमने ही केजरीवाल को ‘ मुख्यमंत्री
केजरीवाल ’ बनाया । इसमें बुराई भी नही है क्योंकि आजकल
गलतफहमी में कई लोग जीते हैं । मीडिया भी इसी गलतफहमी की शिकार है । सबको पता है
जब इन मीडियन लोगन को ये अहसास होने लगा कि केजरीवाल की हवा चल रही है तब ये लोग
अपना कैमरा लेकर केजरीवाल की तरफ भागे । फिर से इन लोगों ने मोर्चा संभाल लिया है ।
दिन-प्रतिदिन किसी न किसी अखबार में आपको केजरीवाल की पूंगी बजाने वाली लेख पढ़ने
को मिल ही जाएंगे। धर्म से ये मीडिया वाले
मोदी को दिखाने के लिए बाध्य तो हैं ही गाहे-बगाहे केजरीवाल को दिखाना भी इनकी
मजबूरी है ताकि जनता जर्नादन को ये भनक न लगे कि अपनी मीडिया बिकाऊ है । फिलहाल
केजरीवाल वाराणसी से मोदी के चुनावी रंग में भंग बनने को तैयार हैं । उनका ये
मिजाज कुछ लोगों को रास नही आया और किसी ने स्याही फेंका तो किसी ने अंडे, इधर तो
किसी ने थप्पड़ भी जड़ दिया इन सब से बेपरवाह यह आम आदमी अपने धुन में लगा है ।
स्याही फेंकने के बाद भी उनमें वही सहजता और मुसकुराहट दिखती है जो किसी दूसरे
नेता के उपर फूल फेंकने के बाद भी नहीं झलकती ।
जिन धनकुबेरों के छतरी तले हमारे नेता पलते रहे
केजरीवाल ने सीधे उन्हें चुनौती दी है न तो समंदर में इतनी कूवत है कि वो लहरों को
चुनौती दे, और न ही भगवान में इतनी करूणा है कि वो भक्त से बैर करे लेकिन केजरीवाल
ने कुछ ऐसा ही किया है इसलिए राजनीति के इस दौर में सबसे आगे हैं, मोदी से भी…..!
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