तुम भूल गये.....कुछ सत्ता है नारी की...!

"तुम भूल गये पुरूषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की" संभवत: जयशंकर प्रसाद ने यह पंक्ति तब लिखी होगी जब नारी का समाज मे कोई स्थान नहीं था,तभी वो उस दौर मे नारी के लिए कुछ सत्ता की मांग उस सामंतवादी समाज से कर रहे थे । लेकिन आज इस दौर मे समाज भी बदला है और कुछ हद तक नारी को सत्ता भी मिली है, फिर भी स्थिति पहले से भयानक है। कल तक औरत को औरत समझा जाता था तभी सत्ता दिलाने की बात होती थी आज तो औरत "औरत" ही न रही।                                                                                                                                                                                  जिन्हें सत्ता मिली वो तो सुरक्षित हैं बाकी का हाल हम हर दिन पत्र-पत्रिकाओं,न्यूज चैनलों के माध्यम से जान ही लेते  हैं। हाल ही मे जब औरत की रक्षा और उनके हकों की बात करने वाले आन्दोलनकारियों का कारवां इंडिया गेट पर इकट्ठा हुआ तो ऐसा लगा मानो इस बार तो बदलाव होना ही है और ये मानना स्वाभाविक भी था, क्योंकि ये हुजूम ,ये कारवां उन युवा तुर्कों का था जिन्हें पुरी दुनियाँ मौजूदा दौर में भारत के ताकतवर होने की वजह मानते हैं। ऐसा कभी-कभी होता है कि सवाल ही सबसे बडी़ समस्या बन जाए इन सबों के बावजूद स्थिति क्यों नही बदलती यही मेरी समस्या है और सवाल भी..??                                                                                                                                                                                                                            अक्सर कहने वाले बड़ी आसानी से कह देते हैं कि देश मे अशिक्षित और अनपढ़ लोगों की वजह से औरत सुरक्षित नही है ऐसा कहने वाले अधिकतर बुद्धिजीवी लोग होते हैं। बचपन से ही इनका नाम सुनता आ रहा हूँ ,जवानी आ गई मगर इनकी बात अब तक समझ में न आयी। मगर अब एक बार तो इनसे मिलने का मन करता  है, पुछने का दिल करता है कि आपकी बुद्धि भ्रष्ट तो नहीं हो गई य़ा है ही नही सिर्फ जिए जा रहे हैं ढ़कोसला बुद्धि के साथ। तरूण तेजपाल तो बुद्धिजीवी ही थे, बोनस ये था कि पत्रकार थे और फिर JNU तो बुद्धिजीवियों की प्रयोगशाला है फिर यहाँ या इनके आसपास बलात्कार की घटनाएं क्यों होती है?????                                                                                                                                                                                       दरअसल ये लोग औरत को औरत न समझ कर महज एक खेलने का सामान समझते हैं,लूटने का खजाना समझते हैं। अपने घर की माँ-बहनों को भी शायद सामान ही समझते होंगें । बात अब कुछ सत्ता देने की नही है न ही कुछ सत्ता सौंपने की है ,अगर देना ही है तो पूरी सत्ता दीजिए। होना तो ये चाहिए था कि औरत घर में रोटी बनाए तो हम पुरूष सब्जी और सलाद।हम यह क्यों नही मानते कि जो औरत बिना हमारे हस्तक्षेप के घर और परीवार संभाल सकती है  वो उसी हुनर और कुशलता के साथ सरकार भी संभाल लेगी तब हालात जैसे भी हों पर इतना तय है आज से बेहतर ही होंगें????।

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