कहाँ अकबर..कहाँ मोदी.. ?.....!

जब हुमायूं बीकानेर से भाग रहा था उन्ही दिनों 15 अक्टूबर 1542 को जन्में जलालुद्दीन मुम्मद अकबर का जीवन जोखिमों से भरा हुआ था जब वह केवल एक साल का था । हुमायूं को कामरान द्वारा बन्दी बना लिए जाने से बचने के लिए अपने दुधमुंहे बच्चे को छोड़कर ईरान भागना पड़ा । शुरूआत मे कामरान ने अकबर की अच्छी देखभाल की बाद मे मन मे खोट आया और हिन्दुस्तान के भावी नन्हें शहंशाह को उसने आग उगलती तोपों की जद मे पड़ने वाले परकोटे पर रख दिया ।

                                    पर कुछ लोग पैदा होने से पहले ही ऊपरवाले से करार करवा लेते हैं कि हमें इतने दिनों तक जीना है और अपनी विरासत को आगे ले जाना है अकबर इन्हीं में से एक था । वहीं आज के किसी नेता के पतलून के नीचे कोई पटाखा छोर दो तो हार्ट अटैक से प्राण चली जाती है इनकी तकदीर ऊपरवाले ने अगर ठीक-ठाक लिख भी दी हो तो भी इनकी मक्कारी और इनकी चाल-चलन इनकी जान ले ही लेती है । अकबर ने जब शासन की बागडोर संभाली तो विरासत के रूप में एक उदार परंपरा उन्हें मिली ठीक उसी तरह जैसे आजादी के बाद हमें हमारा भारत मिला । ये अलग बात है कि हम उस विरासत को संभाल नहीं पाए और जितना हो सका हमने बर्बाद ही किया और करते ही जा रहे हैं । लेकिन अकबर ने उसी विरासत के जरिए न केवल शासन की. बल्कि एक ऐसा हिंन्दुस्तान बनाया जिसकी नींव पर भारत आज भी सांस ले रहा है ।
                                     अकबर एक धार्मिक व्यक्ति था वो पाँच वक्त का नमाज पढ़ता था नियमित रूप से मसजिद की सफाई किया करता था फिर भी उसकी नीति और उसके फैसले कभी भी धर्म से प्राभावित नहीं दिखे । व्यक्तिगत तौर पर जरूर वह धार्मिक मुसलमान था लेकिन एक शहंशाह के नाते धर्म की सारी बंदिशे टूट जाती थी फिर वह केवल राजा होता था जितना मुस्लिम का उतना ही हिन्दू का

आज की राजनीति और राजनेता धर्म के बिना अधूरे हैं गुजरात दंगे के बाद ही मोदी को एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर स्वीकार किया जाने लगा। ये विकास,आर्थिक सफलता, गुजरात मॉडल सब ढ़कोसला है । सही मायनों मे तो मोदी हिन्दू वोट के भी हकदार नही हैं क्योंकि उन्होंने जैसा किया है वो आजतक किसी हिन्दू ने नहीं किया है और न ही हिन्दुओं की ऐसी परंपरा रही है इस लिहाज से मोदी ने हिन्दू परंपरा को भी कलंकित किया है । भारत ऐसा देश है जनाब जहाँ दिन मे वेश्या को सरेआम कुतिया कहना और रात को उसे अपने महल की रानी बना लेना आम बात है लेकिन परंपरा टूट गई वो भी धर्म से जुड़ी हुई तो तमाशा खड़ा हो जाता है । फिर मोदी के खिलाफ सब मौन क्यों हैं ? ?
                                  अकबर जब शासक बना तो सबसे पहले हिन्दुओं से वसूल किया जानेवाला तीर्थकर जिससे करोड़ों की आमदनी होती थी, समाप्त कर दिया । वो इस हिन्दुस्तान को एक रंग में रंगना चाहता था जिससे की मुगल सल्तनत की शांति और समृद्धी बनी रहें । लेकिन आज के भारत को मोदी जैसे नेता अपनी सहुलियत के हिसाब से तोड़ना चाहता है क्योंकि उधर से ही एक पतली गली निकलती है जो सीधे संसद तक जाती है और हर कोई वहीं जाना चाहता है

 ऐसा नही है कि अकबर के समय में धर्म का महत्व नही था या धर्मगुरूओं की कमी थी या फिर आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन नहीं थे जो मदारी बनकर बंदर की तरह आज के लोकतंत्र को नचाते हैं । पहले भी उलेमा थे जिनका दरबार में काफी प्रभाव होता था तुर्की का खलीफा था जिसका फरमान हर किसी को मानना पड़ता था पर अकबर ने न तो उलेमा की सुनी न ही खलीफा की उसने वही फैसले लिए जो जरूरी और जायज थे, जिनसे जनता के हित जुड़े थे ।

                                 हाँ ये अलग बात है कि अकबर के समय मे आज के बेहया पाखंडी धर्मगुरूओं की फौज नहीं थी जो दिन मे लाखों लोगों को राम-नाम का पाठ करवाते हैं और उन्हीं मे से किसी को बहलाकर फुसलाकर अपनी रात गुलजार करते हैं । तब कबीर नानक जैसे लोग थे जिन्होंने केवल एक और सच्चे ईश्वर के होने पर जोड़ दिया था, उन्होंने धर्मग्रंथों के प्रमाण और परंपरा को ठुकराकर अपने दरवाजे सबके लिए चाहे वे किसी धर्म के अनुयायी हों खोल दिए थे । कई सूफी संत खासकर दोआब के चिश्ती सिलसिले और बिहार के कुब्राविया सिलसिले के संत धर्म के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं करते थे ।

चूकिं नरेन्द्र मोदी का आगमन ही धर्म के रथ पर हुआ है इसलिए तांडव तो मचेगा ही, हर कुछ बदलने वाला है नीति , फैसले, न्याय शायद नारायण भी न बदल जाएं । एक तरफ जहाँ अकबर ने उलेमा और खलीफा के फरमानों को ताक पर रखते हुए सल्तनत काल से चली आ रही परंपराओं को तोड़ते हुए एक सशक्त हिन्दुस्तान बनाया वहीं 2014 में मोदी धर्म की पगडंडी थामे आरएसएस की सह पर एक नये और सुनहरे भारत की कल्पना कर रहे हैं । कितना अंतर है ? और यह उतना ही अजीब है जैसे कोई सागर हिमालय से कह रहा हो कि जहाँ तुम हो वहाँ पहले मैं था सोचिए फिर क्या होगा ।

                    हम तो अभागे हैं जो इस युग मे पैदा हुए काश अकबर के समय मे हम पैदा हुए होते कम से कम एक बार उसका दीदार तो हो जाता यह बात कोई मायने नही रखता कि हम हिन्दू होते या मुसलमान …!               

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