कंसार: जहाँ आग भी जलती है, और औरत भी...!!
केले की सूखी हुई पत्तियाँ, आस-पास दो-चार लड़की हाथ में सुप लिए हुए, बीच में बड़ा-सा एक चूल्हा जिसमें धू-धू कर आग जल रही है। उस आग की तपीश में बार-बार वो औरत अपने चेहरे को बचाने की कोशिश कर रही है या फिर उसी आग से खेल रही है समझ नहीं सका। हमारे गाँव में लोग इस जगह को कंसार कहते हैं जहाँ ऊँच-नीच सब आते हैं भुंजा (चावल,गेहूँ,चना, मक्का को आग पर रखे सुराही में लकड़ी से भूंजते हैं ) फॉकने । मैं भी उस दिन चना ले के गया था। उसका नाम सागी वाली है, मैं ने उसका अपना वाला नाम पूछा तो कह बैठी बेटा अब तो यही अपना नाम है। गाँव के लोग उसको सागी वाली ( सागी हमारे यहाँ एक जगह का नाम है) ही कहते हैं, शायद हमारे गाँव का इकलौता जिंदा कंसार कहलीजिए या एक धूल फॉकती संस्कृति। यही कंसार उसका पूरा संसार है, यही उसकी रोटी है जितनी देर तक वो इस आग में जलती है रोटी भी उसी अनुपात में मिलता है, मानो उसको मिलने वाला हर रोटी ने आग में जलने की कसम खा रखी हो । और अब तो वहाँ आग भी कम जलती है ! इस फास्ट फूड के युग मे कौन कमबख्त वहाँ जाकर भुंजा फॉकें, कौन उस आग में जले । बाजार ने जिस हद तक शहर को अपनी बाँहो में सम...
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